रविवार, १४ फेब्रुवारी, २०२१

अम्बेडकरी ब्राह्मण: बापूसाहेब उपाख्य गंगाधर नीळकंठ सहस्रबुद्धे

 

अम्बेडकरी ब्राह्मण: बापूसाहेब उपाख्य गंगाधर नीळकंठ सहस्रबुद्धे

प्रस्तावना

अम्बेडकरी आंदोलन यह भारत कें सामाजिक इतिहास का एक महत्त्वपूर्ण आंदोलन  माना जाता है| भारत में रहनेवाले समस्त दबे कुचले दलित शोषित पिडीत वंचित बहुजन अस्पृश्य समाज को राष्ट्र की मुख्य धारा में लाने का महान कार्य अम्बेडकरी आंदोलन ने साध्य किया| इस आंदोलन को सफल बनाने कें लिये भारत के नानाविध जाती धर्म तथा पंथ के पुरोगामी और सुधारक वृत्ती के महानुभावो ने बाबासाहब डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर को विशेष सहकार्य किया| जिसके फलस्वरूप अम्बेडकरी आंदोलन एक सर्वसमावेशक आंदोलन के रूप मे उभार आया| इस आंदोलन मे हिंदू, मुस्लीम सिख, इसाई, पारशी, जैन तथा बौद्ध धर्म के समाज सुधारको का सक्रीय योगदान दिखाई देता है| किंतु आश्चर्य की बात यह है की, डॉ अम्बेडकर ने अपने अम्बेडकरी आंदोलन के माध्यम से जिस ब्राह्मणवाद पर कठोर प्रहार किये उसी ब्राह्मण जाती के अनेक पुरोगामी तथा सुधारक व्यक्तीयो ने डॉ अम्बेडकर को इस आंदोलन को सफल बनाने के लिये सहकार्य किया| ऐसे ही ब्राह्मण जाती के एक सुधारणावादी व्यक्तिमत्व बापूसाहेब उपाख्य गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे इन्होने मुंबई प्रांत में अम्बेडकरी आंदोलन को सफल बनाने में उल्लेखनीय सहकार्य किया| जो अपने कार्य से अम्बेडकरी आंदोलन मे ‘अम्बेडकरी ब्राह्मण’ इस नाम से प्रसिद्ध हुये| उनके अम्बेडकरी आंदोलन में योगदान पर संशोधकीय तथ्य प्रकाशित करना यह प्रस्तुत शोधनिबंध का उद्देश्य है|

प्रारंभिक जीवन

गंगाधर नीलकंठ सहस्त्रबुद्धे इनके जीवन के प्रारंभिक काल के संदर्भ मे पर्याप्त जानकारी प्राप्त नही होती| उपलब्ध लिखित स्त्रोत के माध्यम से यह पता चलता है कि, गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इनका जन्म महाराष्ट्र मे एक मराठी चित्पावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था| उनका परिवार एक कर्मठ सनातन ब्राह्मण परिवार था| ऐसे सनातनी परिवार मे जन्मे गंगाधर मात्र बचपन से ही सुधारक वृत्ती के थे| हिंदू धर्म की विषमतावादी कुप्रथाये उन्हे दुखी करती थी| इसलिये वे माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत सामाजिक कार्य करने हेतू सोशल सर्विस लीग इस सेवाभावी संस्था से जुड गये| मुंबई के गिरणी कामगार वर्ग में सामाजिक सुधारणा करने के लिये नारायण मल्हार जोशी इनके प्रयास से दिनांक १९ मार्च १९११ को सोशल सर्विस लीग इस सामाजिक संस्था की स्थापना मुंबई में की गयी थी| लीग के माध्यम से मुंबई के गिरणी कामगारो की बस्तीयो में चलता फिरता मुफ्त ग्रंथालय, रात्र पाठशाला, प्रौढ शिक्षा, महिला औद्योगिक पाठशाला आदी उपक्रम चलाये जाते थे| इस प्रकार के कार्य करनेवाली लीग यह ब्रिटीश भारत की प्रथम सामाजिक संस्था थी|[1] ऐसा विशेष सामाजिक कार्य करनेवाली सोशल सर्विस लीग द्वारा गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने अपने सामाजिक कार्य का शुभारंभ किया| सामाजिक कार्य करने का पहला पाठ गंगाधर सहस्त्रबुद्धे को इसी संस्था मे प्राप्त हुआ और इसी संस्था के माध्यम से उनकी डॉ अम्बेडकर से मुलाकात हुई|

आंबेडकर से प्रथम भेट

इ. स. १९२३ में लंडन विश्वविद्यालय से बार अॅट लॉ की पदवी प्राप्त करने के उपरांत डॉ अम्बेडकर ने मुंबई के उच्च न्यायालय में वकिली व्यवसाय करने का निर्णय लिया| किंतु वे महार अस्पृश्य जाती के होने कारण उन्हे न्यायालय परिसर में कार्यालय मिलना असंभव था, इसलिये उन्होने दामोदर हॉल परिसर में कार्यालय के लिये जगह खोजना आरंभ किया| इसी दामोदर हॉल में नारायण मल्हार जोशी के सोशल सर्विस लीग का कार्यालय था| नारायण मल्हार जोशी बाबासाहाब डॉ भीमराव रामजी अम्बेडकर के शिक्षक थे| शालेय जीवन में उन्होने आखरी बेंच पर बैठनेवाले बाल भीमराव को आगे के बेंच पर बिठाया था| डॉ अम्बेडकर ने अत्यंत विपरीत परिस्थिती में देश विदेश में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त की इस पर उन्हे गर्व था| अस्पृश्य होने के कारण वकिली के कार्यालय के लिये जगह नही मिल रही यह बात जब डॉ अम्बेडकर ने जोशी को बताई तो उन्होने डॉ अम्बेडकर को अपने सोशल सर्विस लीग के कार्यालय का एक कमरा वकिली कार्यालय के लिये दे दिया|[2] उस समय सोशल सर्विस लीग के इस कार्यालय की संपूर्ण जिम्मेदारी गंगाधर सहस्त्रबुद्धे संभालते थे| इसी कार्यालय में डॉ अम्बेडकर तथा गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन दोनो की प्रथम मुलाकात हुई| समवयस्क, समविचारी अम्बेडकर तथा सहस्त्रबुद्धे एकदुसरे के कार्य प्रती आकर्षित हो गये| जल्दी ही अच्छे मित्र बन गये| डॉ अम्बेडकर के सामाजिक कार्य से प्रेरित होकर गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने अम्बेडकरी आंदोलन में सहभागी होने लगे| अपने उल्लेखनीय कार्य तथा पुरोगामी विचारो से उन्होने अम्बेडकरी आंदोलन मे अपना विशेष स्थान निर्माण किया| 

कुलाबा जिल्हा बहिष्कृत परिषद मे सक्रीय सहभाग

कुलाबा जिल्हा बहिष्कृत परिषद अम्बेडकरी आंदोलन की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण घटना मानी जाती है| इसी परिषद मे महाड तालाब सत्याग्रह की निव रखी गयी| डॉ अम्बेडकर की अध्यक्षता मे आयोजित इस परिषद मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इनका उल्लेखनीय योगदान था| इ. स. १९२४ मे डॉ अम्बेडकर ने दलित शोषित समाज के उत्थान के लिये  बहिष्कृत हितकारिणी सभा की स्थापना की थी| इसी सभा के माध्यम से दिनांक १९ तथा २० मार्च १९२७ को महाराष्ट्र के महाड नामक गाव मे कुलाबा जिल्हा बहिष्कृत परिषद का प्रथम अधिवेशन आयोजित किया गया| वस्तुतः पंढरपूर नामक महाराष्ट्र के एक प्रमुख धार्मिक तीर्थस्थल पर यह परिषद आयोजित करने का डॉ अम्बेडकर का मानस था| किंतु उनके एक कायस्थ सहयोगी अनंतराव चित्रे इन्होने पंढरपूर यह स्थान परिषद के लिये योग्य नही होगा ऐसा सुझाव दिया| ऐसी परिस्थिती मे डॉ अम्बेडकर ने अपने प्रमुख सहयोगीयो से पर्यायी स्थान निश्चिती की चर्चा की उनमे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे समावेश था| स्थान निश्चिती के उपरांत परिषद के अध्यक्ष पद के लिये भी चर्चा की गयी| डॉ अम्बेडकर ही इस परिषद की अध्यक्षता करे ऐसा सुझाव उनके सभी सहकारीयो ने दिया| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने भी इस बात का अनुमोदन किया था|[3] इस परिषद के लिये कोकण, घाट, मुंबई, नागपूर तथा गुजरात आदी प्रांतो से लगभग पाच हजार अस्पृश्य अनुयायी उपस्थित थे| डॉ अम्बेडकर के अनेक प्रमुख सहयोगीयो के साथ गंगाधर सहस्रबुद्धे भी मुंबई खासकर इस परिषद के लिये महाड मे आये थे| परिषद के नियोजन संदर्भ मे महाड के तत्कालीन नगराध्यक्ष सुरेंद्रनाथ टिपणीस के निवास पर हुई मिटिंग मे भी उन्होने सहभाग लिया| परिषद मे उन्होने अपनी खास शैली मे अस्पृश्य समाज के उत्थान के विषय मे भाष्य किया था| परिषद की समाप्ती के उपरांत अस्पृश्य समाज को महाड के चवदार तालाब का पानी पिने का अधिकार प्राप्त करने के लिये आयोजित जुलूस मे भी गंगाधर सहस्त्रबुद्धे शामिल हुये थे| अस्पृश्य लोगो ने चवदार तालाब का पानी प्राशन किया इसलिये महाड के प्रतिगामी सनातनी कर्मठ सवर्ण हिंदूओ ने परिषद मे आये अस्पृश्य लोगो को जबरदस्त पिटाई की| इसके विरोध मे अम्बेडकरी आंदोलन के माध्यम  से जगह जगह निषेध सभाओ का आयोजन किया गया| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन सभाओ मे उत्फूर्त हिस्सा लिया| दिनांक २३ मे १९२७ को मुंबई के परेल नामक स्थान पर सहस्रबुद्धे की अध्यक्षता मे महाड के सनातनी सवर्ण हिंदूओ का निषेध किया गया|[4] डॉ अम्बेडकर की अध्यक्षता मे दिनांक ५ जुलै १९२७ को मुंबई मे आयोजित निषेध सभा मे भी वे विशेष रूप से उपस्थित थे| इस प्रकार कुलाबा जिल्हा बहिष्कृत परिषद मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे का सक्रीय सहभाग स्पष्ट होता है|

समता वृत्तपत्र में लेखन

डॉ अम्बेडकर ने अस्पृश्य समाज के जनजागरण के लिये अनेक वृत्तपत्र चलाये| उनमे समता यह मराठी भाषा मे प्रकाशित होनेवाला एक प्रमुख वृत्तपत्र था| समता यह डॉ अम्बेडकर द्वारा इ. स. १९२७ मे स्थापित समता समाज संघ नामक संस्था का मुखपत्र था| जो इ. स. १९२८ मे प्रारंभ हुआ था| इस वृत्तपत्र के जडणघडण मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे का योगदान था तथा उन्होने इस वृत्तपत्र मे विपुल मात्रा मे लेखन कार्य भी किया था| समता के दिनांक १३ जुलै १९२८ के अंक मे उन्होने ‘थोतांड नव्हे थोतांडांचा काळ’ नामक लेख लिख कर समता वृत्तपत्र का समर्थन किया|[5]

जनता वृत्तपत्र में लेखन

इ. स. १९३० मे डॉ अम्बेडकर ने मराठी भाषा मे जनता नामक नया वृत्तपत्र शुरू किया| इस वृत्तपत्र मे भी गंगाधर सहस्त्रबुद्धे सक्रीय योगदान था| इ. स. १९३३ मे डॉ अम्बेडकर के भंडारी जाती के सहकारी भास्करराव कद्रेकर के संपादन मे जनता का एक विशेष अंक प्रकाशित किया गया| इस विशेष अंक मे अनेक लेखको अपने सामाजिक विचार प्रकट किये| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने डॉ अम्बेडकर के सन्मान मे ‘आमचे आंबेडकर’ यह लेख लिख कर उनके कार्यकर्तुत्व को उजागर किया| इस विशेष अंक के प्रकाशन मे अम्बेडकरी आंदोलन के अनेक समाज सुधारको का बहुमुल्य सहकार्य था| जिसमे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे भी एक थे| जिनके योगदान स्वरूप संपादक भास्करराव कद्रेकर ने अंक मे उनका आभार व्यक्त किया था| इस अंक मे अम्बेडकरी आंदोलन के प्रमुख समाज सुधारको के छायाचित्र प्रकाशित किये गये थे| जिसमे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इनका छायाचित्र समाविष्ट था|[6] इससे यह प्रतीत होता है की, अम्बेडकरी आंदोलन मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इनका कार्य उल्लेखनीय स्वरूप का था|

जनता वृत्तपत्र का संपादन कार्य

इ. स. १९३० मे शुरू जनता यह अम्बेडकरी आंदोलन का एक प्रमुख वृत्तपत्र था जो अस्पृश्य समाज के जनजागरण का कार्य करता था| गंगाधर सहस्रबुद्धे ने जनता के संपादक के रूप मे भी मौलिक कार्य किया| अपने संपादन मे सहस्त्रबुद्धे ने जनता का प्रचार प्रसार अस्पृश्य समाज मे विलक्षण गती से किया था| दिनांक १४ एप्रिल १९४२ को डॉ अम्बेडकर के सुवर्ण महोत्सवी जयंतीनिमित्त जनता का एक विशेष अंक प्रकाशित किया गया| इस विशेष अंक का संपादन कार्य भी गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने सफलतापूर्वक किया था| इससे यह सिद्ध होता है की, गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने अम्बेडकरी आंदोलन मे अपना एक महत्त्वपूर्ण स्थान निर्माण किया था तथा वे डॉ अम्बेडकर के विश्वास पर पूर्ण रूप से खरे उतरे थे| जिसके परिणामस्वरूप डॉ अम्बेडकर ने उन्हे संपादक पद जैसी अम्बेडकरी आंदोलन की अनेक महत्त्वपूर्ण जीम्मेदारीया सौपी थी| जिसका निर्वाहन गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने बडे प्रामाणिकता तथा सफलता से किया था|

महाड सत्याग्रह परिषद

अस्पृश्य समाज ने महाड के चवदार तालाब का पानी प्राशन करने के कारण सनातनी प्रतिगामी हिंदूओ ने चवदार तालाब का पंचगव्य से शुद्धीकरण किया| परिणामस्वरूप डॉ अम्बेडकर ने महाड मे सत्याग्रह करने का निश्चय किया| महाड का सत्याग्रह यह अम्बेडकरी आंदोलन का मिल का पत्थर माना जाता है| डॉ अम्बेडकर की अध्यक्षता मे दिनांक २५ तथा २६ दिसंबर १९२७ को आयोजित महाड सत्याग्रह परिषद मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया| इस परिषद के लिये वे डॉ अम्बेडकर के साथ मुंबई से महाड आये थे| कुलाबा जिले के जिल्हाधिकारी के साथ हुई चर्चा मे वे भी डॉ अम्बेडकर के साथ थे| अम्बेडकरी आंदोलन के अन्य समाज सुधारको के भाती गंगाधर सहस्रबुद्धे भी इस परिषद मे सक्रीय रूप से उपस्थित थे| इस परिषद मे वे केवल उपस्थित ही नही थे बल्की इस परिषद मे ऐसा उल्लेखनीय कार्य किया की, भारत के समाज परिवर्तन के इतिहास मे उनका नाम अजरामर हो गया| इस परिषद को सफल बनाने के जिन जिन समाज सुधारको ने प्रयास किये उन सभी के प्रती अस्पृश्य समाज ने इस परिषद मे कृतज्ञता व्यक्त की गयी| इनमे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे का नाम प्रमुखता से शामिल था|   

मनुस्मृती दहन

महाड सत्याग्रह परिषद मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने जो उल्लेखनिय कार्य किया जिसके कारण उनका नाम अम्बेडकरी आंदोलन मे सुनहरे अक्षरो से लिखा गया, वह था हिंदू धर्म के प्रमुख धर्मग्रंथ मनुस्मृती का दहन| परिषद के पहले दिन दिनांक २५ दिसंबर १९२७ की शाम को परिषद का कार्य संपन्न होने के बाद गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने स्वयं पुढाकर लेकर मनुस्मृती के दहन का प्रस्ताव पारित किया| पा. ना. राजभोज जैसे समाज सुधारक उनके प्रस्ताव का अनुमोदन किया था| मनुस्मृती दहन के अवसर पर गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृती के कुछ विषमतावादी मंत्रो का उच्चारण करके उपस्थित अस्पृश्य समाज को उसका अर्थ भी बताया| इसके उपरांत अस्पृश्य समाज के साधुसंतो के समक्ष उन्होने स्वयं अपने हाथो से मनुस्मृती इस ग्रंथ का जाहीर रूप से दहन किया|[7] उल्लेखनिय बात यह है की इस महान घटना के स्मरणार्थ आज भी अम्बेडकरी अनुयायी २५ दिसंबर यह दिन मनुस्मृती दहन दिन के रूप मे मनाते है| इस प्रकार गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने मनुस्मृती दहन का कार्य करके भारत के सामाजिक इतिहास मे अपना नाम अंकित किया|

समता समाज संघ का कार्य

तत्कालीन विषमतावादी भारतीय समाज मे समता प्रस्थापित करने के उद्देश्य से डॉ अम्बेडकर इ. स. १९२७ मे समाज समता संघ नामक संघटन स्थापन किया| इस संघ के विकास मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने मह्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह्न किया| संघ के प्रचार प्रसार के लिये जगह जगह सभाओ का आयोजन किया गया उनमे गंगाधर सहस्रबुद्धे ने बढचर कर हिस्सा लिया| अस्पृश्य समाज को संघ के कार्य की जानकारी प्राप्त हो इसलिये एक हस्तपत्रिका प्रसिद्ध की उस पर अम्बेडकरी आंदोलन के प्रमुख समाज सुधारको के नाम थे उनमे एक नाम गंगाधर सहस्रबुद्धे इनका भी था| समाज मे समता प्रस्थापित करने हेतू संघ ने पारिवारिक मिश्र सहभोजन यह उपक्रम शुरू किया| इसमे अलग अलग जाती धर्म के स्पृश्य अस्पृश्य लोग अलग अलग दिन अलग अलग लोगो के घर जाकर सामूहिक सहभोजन करते थे| इस उपक्रम मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे उत्स्फुर्ता से शामिल हुये थे इतना ही नही उन्होने अपने घर मे भी सामुहिक सहभोजन का आयोजन किया जिसमे विभिन्न जाती धर्म के स्पृश्य अस्पृश्य लोग सहभागी हुये थे|[8] लोकमान्य बाळ गंगाधर टिलक के सुपुत्र श्रीधरपंत टिळक इन्होने पुना मे अपने घर मे संघ की शाखा स्थापन की थी| इस स्थापना कार्यक्रम के लिये गंगाधर सहस्त्रबुद्धे डॉ अम्बेडकर के साथ मुंबई से पुना गये थे| इस प्रकार समता समाज संघ मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया| 

नाशिक का काळाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह

इ. स. १९३० मे डॉ अम्बेडकर अस्पृश्य समाज के धार्मिक अधिकार के लिये महाराष्ट्र के  नाशिक शहर मे काळाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रह किया| इस सत्याग्रह की सफलता के लिये गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इन्होने अपना उल्लेखनिय योगदान दिया| सत्याग्रह की सहायता करने के लिये ‘सत्याग्रह सहायक मंडल’ स्थापन किया गया| इस मंडल मे गंगाधर सहस्रबुद्धे इन्होने बतौर उपाध्यक्ष अपना दायित्व निभाया|[9] इतना ही नही वे समय समय इस सत्याग्रह कॉ उपस्थित रहने के लिये मुंबई से नाशिक आते थे| काळाराम मंदिरप्रवेश सत्याग्रह मे सहभागी  सत्याग्रही वीरो को ब्रिटीश सरकार ने कारावास की शिक्षा दि थी| ऐसे सत्याग्रही वीरो का सन्मान करने के लिये अम्बेडकरी आंदोलन के माध्यम से जगह जगह अभिनंदन सभाये आयोजित की गयी| दिनांक २४ जनवरी १९३२ को मुंबई के दामोदर हॉल मे गंगाधर सहस्रबुद्धे इनकी  अध्यक्षता काळाराम मंदिर प्रवेश सत्याग्रही वीरो का सन्मान किया गया|

गोलमेज परिषद

भारत को राजकीय सुधारणा प्रदान करने हेतू ब्रिटीश सरकार ने लंडन मे गोलमेज परिषद का आयोजन किया था| कुल मिलाकर तीन गोलमेज परिषद संपन्न हुई| इन तीनो परिषद मे डॉ अम्बेडकर अस्पृश्य समाज के राजकीय अधिकार के लिये उपस्थित रहे| प्रथम गोलमेज परिषद मे डॉ अम्बेडकर चयन हुआ इस प्रीत्यर्थ मुंबई के अम्बेडकरी अनुयायीयो उनका सन्मान कार्यक्रम आयोजित किया| इसके लिये गठीत फंड कमिटी मे गंगाधर सहस्रबुद्धे का समावेश था| इतना ही नही उन्होने इस फंड मे अपने हैसियत निधी जमा कर के आर्थिक योगदान भी दिया| अस्पृश्य समाज के हित के लिये डॉ अम्बेडकर ने गोलमेज परिषद मे जो योजना सादर की उसका समर्थन करने के लिये दिनांक ८ जनवरी १९३१ को मुंबई मे पुरुषोत्तम सोळंकी की अध्यक्षता मे एक सभा का आयोजन किया गया| इस सभा मे उपस्थित रह कर गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने डॉ अम्बेडकर अस्पृशोद्धारक योजना का जाहीर समर्थन किया|[10]  दिनांक २७ फरवरी १९३१ को डॉ अम्बेडकर गोलमेज परिषद से मुंबई वापस आये| उनके स्वागत के लिये असंख्य अम्बेडकरी अनुयायी जहाज गोदी पर उपस्थित थे| गंगाधर सहस्रबुद्धे ने स्वयं जहाज पर जाकर डॉ अम्बेडकर का स्वागत सन्मान किया था|

पुणे करार

पुणे करार यह आधुनिक भारत के इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है अस्पृश्य समाज के राजकीय अधिकारो मद्दे नजर रखते हुये डॉ अम्बेडकर तथा महात्मा गांधीजी इन राष्ट्र डॉ महापुरुषो मे पुणे करार दिनांक २४ सप्टेबर १९३२ को पुना के येरवडा जेल मे हुआ| इस करार के समय डॉ अम्बेडकर ने महात्मा गांधीजी के अस्पृश्यता विषयक कार्य तथा विचारो का विरोध किया परिणामस्वरूप भारत के तथाकथित राष्ट्रवादी लीग डॉ अम्बेडकर के खिलाफ हो गये| ऐसी विपरीत परिस्थिती मे अम्बेडकरी आंदोलन के जिन समाज सुधारको ने डॉ अम्बेडकर साथ नही छोडा उसमे से एक गंगाधर सहस्त्रबुद्धे थे| डॉ अम्बेडकर को समर्थन देने के लये अनेक अम्बेडकरी अनुयायीयो ने सभाये आयोजित की|  दिनांक ८ अक्तूबर १९३२ को गंगाधर सहस्त्रबुद्धे की अध्यक्षता मे मुंबई मे अस्पृश्य समाज की एक सभा आयोजित की गयी| ‘बाबासाहाब अपनी विशाल विद्वता अचल मनोधैर्य तथा अद्वितीय पराक्रम से जगमान्य हुये है|’ ऐसे गौरवपूर्ण विचार गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने पुणे करार के संदर्भ मे अपने अध्यक्षीय भाषण मे डॉ अम्बेडकर के समर्थनार्थ व्यक्त किये थे|[11]

शिक्षा का प्रचार-प्रसार 

अम्बेडकरी आंदोलन का एक मूल उद्देश अस्पृश्य समाज मे शिक्षा का प्रचार प्रसार था| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने अस्पृश्य समाज मे शिक्षा का प्रचार प्रसार करने के लिये उल्लेखनीय योगदान दिया| शिक्षा के प्रचार प्रसार के लिये जगह जगह होने वाली सभाओ मे उन्होने जमकर हिस्सा लिया दिनांक ३ जून १९२९ को सुरेंद्रनाथ टिपणीस की अध्यक्षता आयोजित महाड की सभा मे महाड विद्यार्थी आश्रम को आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव पारित किया गया| मुंबई के कामाठीपुरा मे सीताराम केशव बोले की अध्यक्षता मे आयोजित सभा मे ठाणे, अहमदाबाद तथा धारवाड के विद्यार्थी आश्रम को आर्थिक मदद करने का प्रस्ताव पारित किया गया| इन सभा मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे उपस्थित थे, इतना ही नही उन्होने अस्पृश्य समाज के विद्यार्थी आश्रम को आर्थिक सहकार्य भी किया|

कामगार जागृती

अम्बेडकरी आंदोलन ने गिरणी कामगार वर्ग के उत्थान के अनेक प्रयास किये| कामगारो के जागरण के लिये जगह जगह सभा परिषदो का आयोजन किया गया| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने इन सभाओ मे योगदान दिया| मुंबई के परेल मे कामगार मैदान पर डॉ. पुरुषोत्तम सोळंकी की अध्यक्षता मे सभा अस्पृश्य समाज के  मजदूरो संघटन आवश्यकता का प्रस्ताव पारित किया गया| इस प्रस्ताव पर गंगाधर सहस्रबुद्धे ने उपस्थित अस्पृश्य समाज को मार्गदर्शन किया|

कुलाबा जिल्हा शेतकरी परिषद

अम्बेडकरी आंदोलन ने किसान तथा कृषी मजदूर वर्ग के उत्थान के लिये भी कार्य किया| किसान तथा कृषी मजदूर वर्ग के जागरण के लिये अनेक स्थानो पर सभाओ का आयोजन किया गया| गंगाधर सहस्त्रबुद्धे ने इन सभाओ मे हिस्सा लेकर किसानो के लिये कार्य किया| दिनांक ३१ डिसेंबर १९३१ को रोहे अष्टमी मे बाळ गंगाधर खेर की  अध्यक्षता मे आयोजित कुलाबा जिल्हा शेतकरी परिषद के दुसरे अधिवेशन मे गंगाधर सहस्रबुद्धे ने किसान तथा कृषी कामगार वर्ग को न्याय मिलना चाहिये इस प्रकार का मत व्यक्त किया|[12]

म्युनिसिपल कामगार संघ

          मुंबई महानगरपालिका के कामगारो समस्याओ का निपटारा करने के लिये इ. स. १९३४ मे डॉ अम्बेडकर की अध्यक्षता मे मुंबई म्युनिसिपल कामगार संघ की स्थापना की गयी| यह संघ ऑल इंडिया म्युनिसिपल वर्कर्स फेडरेशन के नाम से जाना जाता है| इस संघ मे गंगाधर सहस्रबुद्धे ने अत्यंत महत्त्वपूर्ण कार्य किया| डॉ अम्बेडकर ने उन्हे संघ के सचिव पद का दायित्व सौपा था|[13] इस संघ के माध्यम से कामगार वर्ग के सर्वांगीण विकास के लिये अथक प्रयास किये|

अखिल मुंबई इलाखा महार परिषद

          इ. स. १९३५ मे डॉ अम्बेडकर ने हिंदू धर्म का त्याग करने की धर्मांतर घोषणा की| इस घोषणा पर विचारविमर्श करने के लिये दिनांक ३०-३१ मे १९३६ को मुंबई मे हैद्राबादी आंबेडकर के नाम से प्रसिद्ध बी. एस. व्यंकटराव अध्यक्षता मे अखिल मुंबई इलाखा महार परिषद का आयोजन किया गया|  इस परिषद मे संपूर्ण भारत से अस्पृश्य उपस्थित थे|  यह परिषद महार जाती की परिषद होने बावजुद भी अनेक स्पृश्य सवर्ण समाज सुधारक इस परिषद को उपस्थित थे| इनमे गंगाधर सहस्रबुद्धे भी एक थे| इस परिषद उन्होने डॉ अम्बेडकर की धर्मांतर घोषणा का जाहीर समर्थन किया था|[14]  

धर्मांतर घोषणा का समर्थन

डॉ अम्बेडकर की धर्मांतर घोषणा ने संपूर्ण भारत मे हलचल निर्माण हुई| अनेक व्यक्तीयो ने धर्मांतर घोषणा का विरोध किया| ऐसी विपरीत परिस्थिती मे जो गिने चुने लोग डॉ अम्बेडकर के समर्थन मे खडे हुये उसमे एक गंगाधर सहस्त्रबुद्धे थे| उनकी अध्यक्षता मे मुंबई के  बांद्रा मे दांडा रोड पर आयोजित आयोजित सभा मे धर्मांतर घोषणा जाहीर समर्थन किया गया|[15]

मूल्यमापन

डॉ अम्बेडकर के नेतृत्व मे संचालित अस्पृश्यता निवारण के अम्बेडकरी आंदोलन मे गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है. अम्बेडकरी आंदोलन मे सहभाग के कारण उनके परिवार अनेक सामाजिक समस्याओ का सामना करना पडा परंतु गंगाधर सहस्त्रबुद्धे इसकी पर्वा न करते हुये अंतिम समय तक अम्बेडकरी आंदोलन मे कार्य किया. अम्बेडकरी अनुयायीयो ने उन्हे बापूसाहेब यह उपाधी प्रदान कर उनके कार्य का गौरव किया.

 

 



[1] Marathisrushti.com

[2] खैरमोडे चां. भ., डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर, खंड २, प्रथम आवृत्ती १९५८, बौद्धजन पंचायत समिती मुंबई, पृ. ६४

[3] जनता, खास अंक, १९३३

[4] बहिष्कृत भारत, दिनांक ३ जून १९२७

[5] समता, दिनांक १३ जुलै १९२८

[6] जनता, खास अंक, दिनांक १५ मे १९३३

[7] कित्ता

[8] समता, २७ जुलै १९२८

[9] कीर धनंजय, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर, सहावी आवृत्ती १९८९, पॉप्यूलर प्रकाशन मुंबई, पृ. १८८

[10] जनता, दिनांक १२ जानेवारी १९३१

[11] कित्ता, दिनांक १५ ऑक्टोबर १९३२

[12] कित्ता, दिनांक ३० जानेवारी १९३२

[13] सुरवाडे विजय, समकालीन सहकाऱ्यांच्या आठवणीतील डॉ बाबासाहेब आंबेडकर, द्वितीय आवृत्ती २००७, लोकवाङ्मय गृह मुंबई, पृ. ३१

[14] खैरमोडे चां. भ., डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर, खंड ६, प्रथम आवृत्ती १९८५, महाराष्ट्र राज्य साहित्य संस्कृती मंडळ मुंबई, पृ. २२३

[15] गेडाम टी, जी, डॉ बाबासाहेब आंबेडकरांचे धर्मांतर, प्रथम आवृत्ती २००६, प्रकाशक शारदा गेडाम नागपूर, पृ १८८